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‘डिजिटल इंडिया’ और उत्तराखंड का बफरिंग सच

उत्तराखंड के इन गांवों में आज भी नेटवर्क खोजने के लिए पहाड़ चढ़ना पड़ता है देहरादून: देश में 5G इंटरनेट की धूम है। हम चांद और सूरज तक पहुंच चुके हैं और शहरों में लोग बिना रुके हाई-स्पीड वीडियो देख रहे हैं। लेकिन ‘डिजिटल इंडिया’ के इस चमकते पोस्टर के पीछे एक स्याह अंधेरा भी...

52 गढ़ समाचार विशेष: उत्तराखंड में स्वरोजगार की उड़ान, जानिए सरकार की वो 6 प्रमुख योजनाएं जो बना सकती हैं आपको आत्मनिर्भर

देहरादून (52 गढ़ समाचार डेस्क): उत्तराखंड में पलायन एक गंभीर समस्या रही है, लेकिन अब पहाड़ का युवा नौकरी मांगने वाले की जगह नौकरी देने वाला बनना चाहता है। राज्य के युवाओं, महिलाओं और प्रवासियों को अपने ही गांव-कस्बे में रोजगार स्थापित करने में मदद करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार मिलकर कई बेहतरीन...

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‘डिजिटल इंडिया’ और उत्तराखंड का बफरिंग सच

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उत्तराखंड के इन गांवों में आज भी नेटवर्क खोजने के लिए पहाड़ चढ़ना पड़ता है

देहरादून: देश में 5G इंटरनेट की धूम है। हम चांद और सूरज तक पहुंच चुके हैं और शहरों में लोग बिना रुके हाई-स्पीड वीडियो देख रहे हैं। लेकिन ‘डिजिटल इंडिया’ के इस चमकते पोस्टर के पीछे एक स्याह अंधेरा भी है, जो उत्तराखंड के दूरस्थ गांवों में पसरा है। विडंबना देखिए कि जिस दौर में सरकारें ‘ई-गवर्नेंस’ और ‘डिजिटल पेमेंट’ के ढोल पीट रही हैं, उसी दौर में देवभूमि के दर्जनों गांवों में लोग एक अदद ‘हेलो’ बोलने के लिए मीलों पैदल चलकर किसी ऊंची पहाड़ी या पेड़ की तलाश करते हैं। हालात इतने हास्यास्पद और दुखद हैं कि चुनाव या सरकारी सर्वे का डेटा ऑनलाइन अपलोड करने के लिए अधिकारियों को भी पहाड़ों की चोटियां नापनी पड़ती हैं।

उत्तरकाशी के ‘डार्क जोन’: जहां आज भी है ‘नो-सिग्नल’ का सन्नाटा

उत्तरकाशी जिले के कई दूरस्थ गांव संचार क्रांति से कोसों दूर हैं और विकास की राह जोह रहे हैं। जिले की दो प्रमुख पट्टियों के कई गांव आज भी नेटवर्क से पूरी तरह वंचित हैं:

  • पट्टी पंचगाड़: इस क्षेत्र के फिताडी, रखया, हरिपुर, कासला, रावा और लिवाड़ी गांव नेटवर्क से पूरी तरह कटे हुए हैं।
  • पट्टी बडासु: यहां के डाटमीर, गंगाड़, पवाणी और ओसला गांवों में भी मोबाइल नेटवर्क का नामोनिशान नहीं है।

इन खूबसूरत वादियों में रहने वाले लोगों के लिए महंगा स्मार्टफोन बस एक ‘टॉर्च’, ‘कैमरा’ या ‘कैलकुलेटर’ बनकर रह गया है।

आशु चौहान का बयान: “असुविधाओं का पहाड़ झेल रहे हैं हमारे गांव”

उत्तरकाशी के मोरी ब्लॉक की ग्रामसभा किराणू के निवासी आशु चौहान ने क्षेत्र की जमीनी हकीकत को बयां करते हुए बताया कि उनके गांव सहित आसपास के कई इलाकों में नेटवर्क की भारी समस्या है।

आशु चौहान के अनुसार, “सिर्फ हमारे गांव में ही नहीं, बल्कि ग्राम सभा किराणु, दुचाणु, डगोली, माकुडी, बरनाली, टिकोची, और मोल्डी आदि गांव भी आज तक मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट की सुविधा से पूरी तरह वंचित हैं। आपात स्थिति में किसी से संपर्क करना हो, बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई करनी हो या सरकारी योजनाओं का लाभ लेना हो, नेटवर्क न होने के कारण इन सभी गांवों के लोगों को हर दिन भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।”

यह बयान स्पष्ट करता है कि ‘डिजिटल इंडिया’ का लाभ अभी भी उत्तरकाशी के अंतिम छोर पर बसे इन दूरस्थ गांवों तक नहीं पहुंच सका है।

पूरे उत्तराखंड का हाल: 5G के शोर में 700 गांवों का सन्नाटा

केवल उत्तरकाशी ही नहीं, बल्कि पूरा उत्तराखंड इस डिजिटल विभाजन (Digital Divide) का दंश झेल रहा है:

  • भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) और सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, उत्तराखंड के लगभग 700 गांव आज भी मोबाइल नेटवर्क से अछूते हैं, जिनमें चीन और नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे संवेदनशील गांव भी शामिल हैं।
  • राज्य के 16,793 गांवों में से लगभग 3,500 गांव ऐसे हैं जहां लोग अभी भी केवल 2G सेवा के भरोसे बैठे हैं।
  • ऑनलाइन पढ़ाई के इस आधुनिक दौर में, दूरस्थ क्षेत्रों के छात्रों को इंटरनेट सिग्नल के लिए अपने घरों से दूर पहाड़ियों या पेड़ों पर चढ़ना पड़ता है।
  • पिथौरागढ़ जैसे सीमांत क्षेत्रों में कनेक्टिविटी का संकट इतना गहरा है कि कई बार भारतीय नागरिकों को मजबूरन नेपाली सिम कार्ड (नेपाली नेटवर्क) का इस्तेमाल करना पड़ता है।

आखिर क्यों नहीं पहुंच पाया नेटवर्क? (मुख्य कारण)

समाचार रिपोर्टों और जमीनी हकीकत के अनुसार, इस ‘डिजिटल सन्नाटे’ के पीछे कई प्रमुख कारण हैं:

  1. कठिन भौगोलिक परिस्थिति (Tough Terrain): उत्तराखंड का ऊबड़-खाबड़ और पहाड़ी इलाका मोबाइल नेटवर्क के विस्तार में सबसे बड़ी बाधा है। घने जंगलों और ऊंची चोटियों के कारण सिग्नल बाधित होते हैं और ऐसे दुर्गम इलाकों में टॉवर स्थापित करना तथा बुनियादी ढांचा खड़ा करना बेहद मुश्किल हो जाता है।
  2. टेलीकॉम कंपनियों का ‘प्रॉफिट मॉडल’: निजी टेलीकॉम कंपनियों (जैसे Jio, Airtel, Vi) के लिए दूरस्थ और कम आबादी वाले गांवों में भारी निवेश करना आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं है। पहाड़ों में छितरी हुई आबादी के कारण कंपनियां यहां टॉवर लगाने से बचती हैं।
  3. जटिल वन अनुमतियां (Forest Clearances): चूंकि राज्य का एक बहुत बड़ा हिस्सा वन भूमि के अंतर्गत आता है (खासकर ओसला, गंगाड़ जैसे इलाके जो गोविंद वन्यजीव विहार के करीब हैं), इसलिए नए टॉवर लगाने के लिए वन विभाग से जगह और आवश्यक अनुमतियां मिलने में सालों लग जाते हैं।
  4. सरकारी मशीनरी की सुस्ती: जिन दुर्गम क्षेत्रों में निजी कंपनियां नहीं जातीं, वहां BSNL और सरकार के ‘यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड’ (USOF) की जिम्मेदारी होती है। लेकिन जनरेटर के लिए डीजल की कमी, खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और लेटलतीफी के कारण योजनाएं अक्सर दम तोड़ देती हैं।

निष्कर्ष: पलायन और खोखले दावे

डिजिटल कनेक्टिविटी न होना केवल बातचीत रुकने तक सीमित नहीं है; यह स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के अवसरों को भी खत्म कर रहा है। जब तक आशु चौहान के गांव किराणू, ओसला, लिवाड़ी, डाटमीर और राज्य के अन्य 700 गांवों के हर घर में नेटवर्क की घंटी नहीं बजती, तब तक ‘डिजिटल इंडिया’ का नारा उत्तराखंड के पहाड़ों से टकराकर बस एक खोखली गूंज ही पैदा करता रहेगा। समय आ गया है कि सरकारें कागजी आंकड़ों से बाहर निकलकर इन पहाड़ों के दर्द को समझें, वरना सुविधाओं के अभाव में गांवों से पलायन यूं ही जारी रहेगा।

Team 52 Garh

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