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विशेष रिपोर्ट: उत्तराखंड में 2000 से 2026 तक पलायन का दर्द और ‘रिवर्स माइग्रेशन’ की उम्मीदें

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उत्तराखंड के गठन (9 नवंबर 2000) का मुख्य उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों का विकास करना और वहां के लोगों को बेहतर आजीविका देना था। लेकिन, पिछले 26 वर्षों में राज्य का सबसे बड़ा दर्द ‘पलायन’ (Migration) बनकर उभरा है। खाली होते गांव, उजड़ते खेत और खामोश घरों ने ‘भूतिया गांव’ (Ghost Villages) जैसी शब्दावली को जन्म दिया है। हालांकि, हालिया सरकारी रिपोर्टों और कोरोना महामारी के बाद राज्य में ‘रिवर्स माइग्रेशन’ (Reverse Migration) की दिशा में कुछ सकारात्मक संकेत भी दिखाई देने लगे हैं।

पलायन के चौंकाने वाले आंकड़े: क्या कहती है रिपोर्ट?

उत्तराखंड सरकार ने इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए 2017 में उत्तराखंड ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग का गठन किया था। आयोग की विभिन्न रिपोर्टों और हालिया न्यूज़ विश्लेषणों से स्थिति की गंभीरता का पता चलता है:

  • स्थायी और अस्थायी पलायन: 2011 से 2018 के बीच 1.1 लाख से अधिक लोगों ने स्थायी रूप से और 3.83 लाख लोगों ने अस्थायी रूप से अपने गांव छोड़े। इसके बाद 2018 से 2022 के बीच भी 28,000 से अधिक लोगों का स्थायी और 3 लाख से अधिक का अस्थायी पलायन दर्ज किया गया।
  • भूतिया गांव (Ghost Villages): 2011 तक राज्य में 1,034 गांव पूरी तरह खाली थे। 2018 तक यह संख्या बढ़कर 1,734 हो गई। 2018 के बाद भी कई और गांव वीरान हो चुके हैं।
  • चिंताजनक जनसांख्यिकी: राज्य के 400 से अधिक गांव ऐसे हैं जहां अब 10 से भी कम लोग रह गए हैं। पलायन के मामले में पौड़ी, अल्मोड़ा और टिहरी जिले सबसे अधिक प्रभावित रहे हैं।

पहाड़ों से पलायन के प्रमुख कारण

आयोग के व्यापक सर्वेक्षण के अनुसार, पहाड़ों से लोगों के मैदानी इलाकों (जैसे देहरादून, हल्द्वानी या राज्य से बाहर) की ओर जाने के पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण जिम्मेदार हैं:

  1. रोजगार का अभाव (50.17%): पहाड़ों में बड़े उद्योगों की कमी और आजीविका के सीमित साधन पलायन का सबसे बड़ा कारण हैं।
  2. स्वास्थ्य एवं शिक्षा (8.83%): दूरस्थ क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी और उच्च शिक्षा संस्थानों का अभाव परिवारों को शहर की ओर धकेलता है।
  3. जंगली जानवरों का आतंक (5.61%): जंगली सूअर, बंदर और भालू जैसे जानवरों द्वारा फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है। आयोग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इसी वजह से राज्य में मंडुवा और झंगोरा जैसी श्रीअन्न (Millets) फसलों के रकबे में पिछले पांच सालों में 27% की भारी गिरावट आई है।
  4. बुनियादी ढांचे की कमी: दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण अच्छी सड़कें, संचार और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी भी एक अहम वजह है।

‘रिवर्स माइग्रेशन’ (Reverse Migration): एक नई उम्मीद

कोरोना (Covid-19) महामारी ने पूरे देश में हाहाकार मचाया था, लेकिन उत्तराखंड के लिए यह ‘रिवर्स माइग्रेशन’ का एक अप्रत्याशित अवसर लेकर आया। महामारी के दौरान 2.15 लाख से अधिक प्रवासी वापस अपने मूल गांवों में लौटे।

यद्यपि महामारी के बाद कई लोग वापस शहरों की ओर गए, लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया और सरकारी डेटा के नवीनतम विश्लेषण (2025-2026) के अनुसार, एक स्थायी रिवर्स माइग्रेशन भी देखा जा रहा है:

  • स्थायी वापसी: पिछले कुछ वर्षों में 6,200 से अधिक लोग स्थायी रूप से अपने गांवों में लौट चुके हैं।
  • युवाओं की भागीदारी: वापस लौटने वालों में 40% लोग 25-35 आयु वर्ग के हैं, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा भर रहे हैं।
  • नया व्यवसाय: इनमें से 39% युवा कृषि और बागवानी से जुड़े हैं, 21% ने पर्यटन/होमस्टे अपनाया है, और 18% पशुपालन के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।

सरकार की रिवर्स माइग्रेशन संबंधी पहलें

राज्य सरकार और पलायन निवारण आयोग ने पहाड़ों को फिर से आबाद करने के लिए बहुआयामी रणनीतियां अपनाई हैं:

  • मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना: युवाओं को पहाड़ों में ही अपना व्यवसाय, छोटी इकाइयां या होमस्टे शुरू करने के लिए भारी सब्सिडी (50% से 80% तक) दी जा रही है।
  • पर्यटन एवं होमस्टे नीति: इको-टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। पारंपरिक पहाड़ी घरों को होमस्टे में बदलकर स्थानीय लोगों के लिए आय के नए स्रोत बनाए गए हैं।
  • मिलेट (श्रीअन्न) नीति: पारंपरिक फसलों (मंडुवा, झंगोरा, काला भट) को व्यावसायिक रूप देने के लिए सरकार ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) तय कर रही है। साथ ही पॉलीहाउस निर्माण, मशरूम उत्पादन और मधुमक्खी पालन के लिए 80-90% तक सब्सिडी दी जा रही है।
  • सीमांत क्षेत्र विकास निधि: अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से लगे गांवों (Frontier Villages) से पलायन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा है। इसके लिए मुख्यमंत्री ने विशेष फंड बनाया है, ताकि सीमांत क्षेत्रों में रोजगार और बुनियादी ढांचा सुनिश्चित हो सके।

निष्कर्ष

उत्तराखंड में पलायन आज भी वापसी (रिवर्स माइग्रेशन) की दर से कहीं अधिक है, जो एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। हालांकि, 2000 के दशक की तुलना में आज स्थिति बदल रही है। पढ़े-लिखे युवा अब मजबूरी में नहीं, बल्कि अवसरों की तलाश में वापस पहाड़ों की ओर लौट रहे हैं। यदि होमस्टे, आधुनिक कृषि और स्वरोजगार की सरकारी नीतियां ज़मीनी स्तर पर बिना किसी लालफीताशाही के प्रभावी रूप से लागू होती रहें, तो उम्मीद है कि आने वाले दशकों में उत्तराखंड के ‘भूतिया गांव’ एक बार फिर गुलजार हो उठेंगे।

Team 52 Garh

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