उत्तराखंड: ‘देवभूमि’ से ‘शराब-प्रदेश’ की ओर बढ़ता सफर और राजस्व की अंधी दौड़

प्रदेश में किसी भी दल की सरकार रही हो, सभी का आबकारी नीति या कहें शराब नीति को लेकर कथनी और करनी में हमेशा अंतर रहा है। शराब की दुकानों के पक्ष में अप्रत्यक्ष रूप से बदलते कानून व नियम इस बात का प्रमाण देते हैं क्योंकि कहीं न कहीं शराब से आने वाली घोषित और अघोषित आय के लालच ने सरकारों का झुकाव हमेशा शराब नीति को और सहज बनाने की ओर ही रखा है। लेकिन वर्तमान में सबसे बड़ा सवाल यह है कि बढ़ती शराब की दुकानों के बीच उत्तराखंड के भविष्य का निर्माण कैसे होगा?

प्रदेश में राजस्व का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत बन चुके आबकारी विभाग को मिलने वाला सरकारी संरक्षण यह दर्शाता है कि मदिरा प्रधान बनते इस प्रदेश में सरकारें और प्रशासन अपने अर्थ-लोभ को साधने के लिए किसी भी कीमत पर जा सकते हैं; चाहे

“योग और धर्मनगरी ऋषिकेश में जनाक्रोश के बीच पुलिस सुरक्षा में शराब की बिक्री हो या फिर डेनिस का कुछ समय तक चला एकाधिकार।”

जहाँ प्रदेश में पहले जगह-जगह दिखते मंदिर और धर्मस्थलों की वजह से उत्तराखंड को ‘देवभूमि’ के रूप में पहचाना जाता था, वहीं अब हर सड़क, हर मोहल्ले में खुली शराब की दुकानों के कारण यदि भविष्य में इस प्रदेश को ‘शराब-प्रदेश’ के रूप में पहचान मिलने लगे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

त्रिवर्षीय आबकारी नीति (2025-2028): विकास का मॉडल या शराब पर पूर्ण निर्भरता?

हाल ही में सरकार ने नई त्रिवर्षीय आबकारी नीति (2025-26, 2026-27 और 2027-28) लागू कर दी है। इसका घोषित उद्देश्य राजस्व में वृद्धि, धार्मिक संवेदनाओं के प्रति सम्मान, स्थानीय उद्योगों और कृषि को बढ़ावा देना है। लेकिन असल में यह नीति प्रदेश की आर्थिक संपन्नता को पूरी तरह आबकारी पर केंद्रित कर देती है। सरकार ने बार-बार होने वाले विरोधों से बचने के लिए अब दुकानों का आवंटन सीधे दो से तीन वर्षों के लिए (द्विवर्षीय/त्रिवर्षीय) करना शुरू कर दिया है। 2026 के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार और देहरादून जैसे जिलों में 90% से अधिक दुकानों का आवंटन रिकॉर्ड गति से पूरा कर लिया गया है। यह सरकार का एक दूरगामी कदम लगता है, अपितु शराब की दुकानों के खिलाफ सड़क पर उतरा जनाक्रोश इस नीति के खोखलेपन को उजागर करता है।

खारास्रोत में अजेंद्र की हत्या और जन-आंदोलन का दमन

ऋषिकेश के खारास्रोत में हाल ही में 28 वर्षीय अजेंद्र कंडारी की शराब ठेके के पास हुई निर्मम हत्या के बाद शराब बिक्री के विरुद्ध जो आंदोलन भड़का, वह कई गंभीर सवाल खड़े करता है। अक्टूबर-नवंबर 2025 में चले इस विशाल आंदोलन में ‘देवभूमि नशामुक्ति संयुक्त संघर्ष समिति’ के बैनर तले स्थानीय लोग सड़कों पर उतरे।

आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि कैसे वन भूमि को राजस्व भूमि बताकर शराब की दुकान के लिए जगह दे दी गई। आबकारी नीति के अनुसार, किसी भी धार्मिक नगरी के नगर निकाय की सात किलोमीटर की सीमा में शराब की दुकान नहीं खोली जा सकती। लेकिन गंगा तट से मात्र 1 किलोमीटर और ऋषिकेश नगर पालिका कार्यालय से सिर्फ 3.5 किलोमीटर दूर खुले इस ठेके को देखकर ऐसा लगता है कि नियमों को केवल कागजों तक सीमित रखा गया है।

इस ठेके से सरकार का लगाव इतना गहरा था कि लगातार 10-15 दिनों तक चले धरने, अनशन और महिलाओं के विरोध के बावजूद, प्रशासन ने भारी पुलिस बल तैनात करके ठेके के ताले खुलवाए।

मंत्री का बेतुका तर्क: इस विवाद पर विधानसभा में मंत्री सुबोध उनियाल ने तर्क दिया कि “ऋषिकेश क्षेत्र में शराब की दुकानें न होने की वजह से यहाँ के लोगों को रायवाला और रानीपोखरी जाना पड़ता था, जिसकी वजह से कई परिवारों ने अपना इकलौता बेटा सड़क दुर्घटना में खो दिया।” यह तर्क राज्य के युवाओं की पीड़ा समझने के बजाय, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और लचर परिवहन व्यवस्था पर पर्दा डालने जैसा लगता है।

विरोध सिर्फ ऋषिकेश तक सीमित नहीं रहा। नवंबर 2025 में ही यमुनोत्री धाम के निकट राना चट्टी में भी आक्रोशित ग्रामीणों ने शराब की दुकान पर ताले जड़ दिए। लेकिन सरकार का समर्थन इन ठेकों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मिलता रहा।

शराब प्रेम का ऐतिहासिक सच: डेनिस विवाद से लेकर हाईवे के दर्जे बदलने तक

उत्तराखंड की सरकारों का यह शराब प्रेम सिर्फ वर्तमान सरकार में ही नहीं दिखता।

हरीश रावत सरकार और डेनिस शराब विवाद (2014): हरीश रावत की कांग्रेस सरकार ने शराब सिंडिकेटों के एकाधिकार को तोड़ने का तर्क देते हुए शराब वितरण का काम उत्तराखंड मंडी परिषद को सौंपा था। लेकिन असल में इसका फायदा ‘डेनिस’ (Rock & Storm Distilleries) नामक एक विशेष शराब ब्रांड को मिला, जिसका पूरे प्रदेश में एकाधिकार स्थापित हो गया। प्रतिस्पर्धा खत्म होने पर अन्य कंपनियों ने हाईकोर्ट का रुख किया। यह विवाद राजनीतिक सौदेबाजी और साजिशों का प्रतीक बन गया।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बचाव (2017): जब सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्गों के 500 मीटर के दायरे में शराब की दुकानों को हटाने का आदेश दिया, तो 2017 में त्रिवेंद्र सिंह रावत की भाजपा सरकार ने 64 राजमार्गों को रातों-रात “जिला सड़कें” (District Roads) में तब्दील कर दिया। इस एक चाल से लगभग 150 से अधिक शराब की दुकानों को दोबारा कानूनी संरक्षण मिल गया और सरकार ने 600 करोड़ रुपये का संभावित नुकसान बचा लिया।

स्वास्थ्य, सामाजिक ताना-बाना और 2026 के नए राजस्व आंकड़े

सरकारें जनता से धर्म और स्वास्थ्य की बातें करती हैं, लेकिन व्यवहार में 25 साल में आबकारी राजस्व में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।

  • 2000-01 में आबकारी राजस्व मात्र 17.54 करोड़ रुपये था।
  • 2024-25 में यह कुल राज्य के कर-राजस्व का लगभग 20% बन गया।
  • अप्रैल 2026 में जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, आबकारी विभाग ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में 4,570.50 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड राजस्व अर्जित किया है (जो पिछले वर्ष से 210 करोड़ अधिक है)।

यह 260 गुना से अधिक की वृद्धि किसी संतुलित विकास की कहानी नहीं, बल्कि अर्थ-लोभ की कहानी बताती है। जब राजस्व इतना महत्वपूर्ण हो जाता है, तो नीतियां जनता के कल्याण के बजाय केवल धन-संग्रह के इर्द-गिर्द घूमने लगती हैं।

एक मौन आपातकाल: उत्तराखंड में 0.3% महिलाएं और 25.5% पुरुष शराब का सेवन करते हैं। शराब से संबंधित मौतों (अनुमानित 3,000-4,000 वार्षिक) और लीवर सिरोसिस के बढ़ते मामलों (58.4%) के बीच सरकार ने आंखें मूंद ली हैं। 2019 में रुड़की और हरिद्वार में नकली शराब से हुई 66 से अधिक मौतों से भी कोई सबक नहीं लिया गया।

क्या विकल्प संभव है?

उत्तराखंड के पास खनिज संसाधन, वन संपदा, जल शक्ति, पर्यटन और कृषि-आधारित उद्योग हैं। पनबिजली से उत्पन्न ऊर्जा क्यों न बेची जाए? ऑर्गेनिक खेती, जैव-विविधता से जुड़े उद्योगों और इको-टूरिज्म में निवेश करके क्या एक टिकाऊ और नैतिक राजस्व मॉडल नहीं बनाया जा सकता?

संविधान के अनुच्छेद 47 के तहत नागरिकों के स्वास्थ्य को बढ़ावा देना राज्य का कर्तव्य है, जिसे उत्तराखंड की सरकारें भूल चुकी हैं। खारास्रोत में उठी आवाजें, अजेंद्र की मौत, यमुनोत्री में जड़े गए ताले और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को चकमा देने की कवायद — ये सब यह तय करने के लिए काफी हैं कि उत्तराखंड आज एक गंभीर मोड़ पर है।

राजस्व जरूरी है, और प्रदेश को चलाने में आबकारी का अदुतीय योगदान है, लेकिन राजस्व से भी अधिक जरूरी है राज्य के युवाओं की सुरक्षा, परिवारों का सुख, और उत्तराखंड की ‘देवभूमि’ वाली पवित्र छवि। यदि सरकार 4,500 करोड़ से बढ़ाकर इसे 7,000 करोड़ तक ले जाने के बजाय स्वच्छ ऊर्जा और पर्यटन आधारित वैकल्पिक राजस्व संरचना तैयार करे, तभी यह विकास पीढ़ियों को संपन्न बनाएगा, न कि आज के युवाओं को खत्म करेगा।