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गुटबाजी की बीमारी से ग्रस्त उक्रांद

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गुटबाजी की बीमारी से ग्रस्त उक्रांद

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उत्तराखंड में कभी “जय पहाड़, जय पहाड़ी” के नारे की गूंज राजनीतिक बदलाव की उम्मीद जगाती थी। लेकिन इस नारे को राजनीतिक ताकत देने वाला उत्तराखंड क्रांति दल यानी उक्रांद एक बार फिर अपनी पुरानी बीमारी से जूझता नजर आ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में पार्टी की बढ़ी सक्रियता से यह उम्मीद जरूर जगी थी कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उक्रांद अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस हासिल कर सकता है। लेकिन पार्टी के भीतर सामने आई गुटबाजी ने इन उम्मीदों पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।

उक्रांद में आंतरिक कलह कोई नई बात नहीं है। पार्टी का इतिहास नेतृत्व संघर्ष, अलग-अलग धड़ों और संगठनात्मक विवादों से भरा रहा है। यही वजह है कि कई मौकों पर मजबूत क्षेत्रीय राजनीतिक विकल्प बनने की संभावना के बावजूद पार्टी अपनी ताकत को एकजुट नहीं रख पाई। गुटबाजी का यही इतिहास उसे सत्ता से दूर ले जाने वाली सबसे बड़ी वजहों में शामिल रहा है।

ताजा विवाद आशुतोष नेगी प्रकरण से सामने आया है। जुलाई 2026 में पार्टी ने नेगी को केंद्रीय उपाध्यक्ष पद से हटाया और अगस्त में छह वर्ष के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया। पार्टी ने उन पर सोशल मीडिया के माध्यम से पार्टी विरोधी और भ्रामक बयान देने तथा अनुशासन का उल्लंघन करने के आरोप लगाए।

निष्कासन के बाद विवाद और गहरा गया। आशुतोष नेगी ने पार्टी नेतृत्व पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाते हुए आंतरिक लोकतंत्र की कमी, टिकट वितरण में पक्षपात और नेतृत्व की कार्यशैली पर आरोप लगाए। उन्होंने काशी सिंह ऐरी पर पार्टी को पिथौरागढ़ से “रिमोट कंट्रोल” के जरिए संचालित करने और प्रदेश अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती की भूमिका सीमित होने का आरोप भी लगाया। नेगी ने नेतृत्व पर भाजपा सरकार के साथ कथित समझौते के आरोप भी लगाए हैं।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अलग विषय है और पार्टी नेतृत्व का अपना पक्ष हो सकता है। लेकिन विवाद ने यह जरूर स्पष्ट कर दिया है कि उक्रांद के भीतर के मतभेद अब संगठन की चारदीवारी तक सीमित नहीं हैं। जब पार्टी के नेता ही सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े दिखाई दें, तो उसका असर संगठन की छवि और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ना स्वाभाविक है।

दूसरी ओर, उत्तराखंड की राजनीति में पुष्कर सिंह धामी का कार्यकाल राजनीतिक स्थिरता के दौर के रूप में देखा जा रहा है। लगातार नेतृत्व परिवर्तन के दौर के बाद धामी के नेतृत्व में भाजपा सरकार का अपेक्षाकृत स्थिर रहना भाजपा के लिए राजनीतिक उपलब्धि माना जा सकता है। ऐसे में 2027 में मतदाताओं का एक वर्ग स्थिर सरकार को प्राथमिकता दे सकता है।

यही स्थिति उक्रांद के लिए चुनौती को और बढ़ाती है। पिछले कुछ वर्षों में पार्टी ने जिन मुद्दों और क्षेत्रीय भावनाओं के जरिए जनता के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश की थी, उसी समय आंतरिक विवाद का सार्वजनिक होना उसके राजनीतिक भरोसे को प्रभावित कर सकता है।

इसी बीच उक्रांद के पूर्व उपाध्यक्ष आशुतोष नेगी ने एक नए “उत्तराखंड डेमोक्रेटिक अलायंस” की शुरुआत करने की बात कही है। नेगी का दावा है कि उनके साथ उक्रांद के कई सदस्य और जनता का समर्थन है। उन्होंने संत समाज के एक बड़े चेहरे के भी उनके साथ आने का दावा किया है, जिसका नाम जल्द सार्वजनिक करने की बात कही गई है। यदि यह पहल आकार लेती है तो उक्रांद के सामने चुनौती और बढ़ सकती है, क्योंकि इससे क्षेत्रीय राजनीति में एक नया धड़ा उभरने की संभावना बनेगी।

उक्रांद में गुटबाजी की कहानी

उत्तराखंड क्रांति दल यानी उक्रांद का इतिहास केवल राज्य आंदोलन के संघर्षों तक सीमित नहीं रहा। अलग राज्य की मांग को राजनीतिक मंच देने वाली इस पार्टी के भीतर समय-समय पर नेतृत्व, रणनीति और संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर गंभीर मतभेद भी सामने आते रहे। 1979 में गठन के बाद उक्रांद ने उत्तराखंड राज्य आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 1990 के दशक में अलग राज्य की मांग को व्यापक राजनीतिक आधार मिला। लेकिन राज्य बनने के बाद पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि आंदोलनकारी संगठन को मजबूत चुनावी राजनीतिक दल में कैसे बदला जाए।

2000 में उत्तराखंड बनने के बाद उक्रांद के सामने अवसर भी बड़ा था और चुनौती भी। जिस मुद्दे के लिए पार्टी ने दशकों तक संघर्ष किया था, वह मांग पूरी हो चुकी थी। अब उसे राज्य की सत्ता, विकास की दिशा और क्षेत्रीय अस्मिता के सवालों पर अपनी स्पष्ट राजनीतिक रणनीति बनानी थी। 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में पार्टी ने कुछ सीटें जीतीं, लेकिन कांग्रेस और भाजपा जैसी बड़ी पार्टियां राज्य की राजनीति में तेजी से मजबूत हो गईं। इसके बाद उक्रांद का चुनावी प्रभाव लगातार सीमित होता गया।

2012 का विभाजन: विवाद खुलकर सामने आया

गुटबाजी का सबसे स्पष्ट और बड़ा उदाहरण 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले का विभाजन माना जाता है। उस समय पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि मूल उक्रांद के नाम और उसके चुनाव चिह्न पर भी संकट खड़ा हो गया। चुनाव आयोग के स्तर पर पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर स्थिति स्पष्ट न रहने के कारण दोनों पक्ष अलग-अलग पहचान के साथ चुनाव मैदान में उतरे। एक धड़ा उक्रांद (पी) के नाम से सामने आया, जिसकी अगुवाई तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष त्रिवेंद्र सिंह पंवार कर रहे थे, जबकि दूसरा धड़ा उक्रांद (डी) के रूप में सामने आया, जिसका नेतृत्व दिवाकर भट्ट ने किया।

यह विभाजन सिर्फ संगठनात्मक पद को लेकर विवाद नहीं था। इसके पीछे पार्टी की राजनीतिक दिशा और नेतृत्व पर नियंत्रण का सवाल भी था। एक ही विचारधारा और एक ही राजनीतिक विरासत का दावा करने वाले नेता अलग-अलग खेमों में खड़े हो गए। परिणाम यह हुआ कि जिस पार्टी को राज्य की क्षेत्रीय राजनीति में एक मजबूत विकल्प बनना चाहिए था, वह खुद अपने संगठनात्मक विवादों में उलझ गई।

इसका सीधा असर चुनावी राजनीति पर पड़ा। 2012 के विधानसभा चुनाव में प्रीतम सिंह पंवार उक्रांद (पी) के टिकट पर जीतने वाले एकमात्र उम्मीदवार रहे। यानी जिस पार्टी ने कभी राज्य आंदोलन के दौरान व्यापक जनसमर्थन जुटाया था, वह विभाजन के बाद विधानसभा में बेहद सीमित प्रभाव तक सिमट गई।

उक्रांद के सामने आज यही सबसे बड़ी चुनौती है। पार्टी के पास उत्तराखंड के स्थानीय मुद्दों को उठाने की राजनीतिक जमीन है, राज्य आंदोलन की विरासत है और क्षेत्रीय अस्मिता से जुड़ी पहचान भी है। लेकिन इस विरासत को चुनावी ताकत में बदलने के लिए सबसे पहले संगठन के भीतर एकता जरूरी है।

2027 का विधानसभा चुनाव उक्रांद के लिए निर्णायक हो सकता है। यदि चुनाव से पहले नेतृत्व विवाद, टिकट को लेकर खींचतान और सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप जारी रहे, तो इसका सीधा असर चुनावी प्रदर्शन पर पड़ सकता है। इसके उलट यदि पार्टी अपने मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाकर अलग-अलग धड़ों को एक मंच पर लाने में सफल होती है, तो वह अपनी राजनीतिक स्थिति को फिर मजबूत कर सकती है।

आखिरकार जनता राजनीतिक दलों के भीतर मतभेदों को समझती है, लेकिन लगातार सामने आने वाली गुटबाजी राजनीतिक भरोसे को प्रभावित करती है। 2027 में मतदाता केवल उक्रांद के नारों और मुद्दों को नहीं देखेगा, बल्कि यह भी देखेगा कि पार्टी खुद कितनी संगठित और एकजुट है।

उक्रांद के पास आंदोलन की विरासत है, लेकिन उस विरासत को राजनीतिक ताकत में बदलने के लिए संगठनात्मक एकता जरूरी है। आशुतोष नेगी प्रकरण ने एक बार फिर वही पुराना सवाल सामने ला दिया है—क्या उक्रांद अपनी गुटबाजी से ऊपर उठकर एकजुट हो पाएगा?

अगर पार्टी इस सवाल का जवाब समय रहते नहीं देती, तो 2027 के चुनाव में उसकी सबसे बड़ी चुनौती भाजपा या कांग्रेस नहीं, बल्कि उसकी अपनी अंदरूनी गुटबाजी बन सकती है।

Team 52 Garh

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